बेल्हा में अब सहेजी जा रही माटी की परिपाटी 

0
677
रवि प्रकाश सिंह ‘चन्दन’
बिलुप्त हो रही लोक परम्पराओं और संस्कृतियों का किया जा रहा संकलन
पौराणिक, ऐतिहासिक , सामाजिक और कई दृष्टिकोण से अपने में विशेष स्थान रखने वाले जनपद प्रतापगढ़ की विशेषता ही अलग है । बेल्हा के उप नाम से बुलाये जाने वाले इस जनपद में कुछ ऐसे ही विशेष कार्य शुरू हो हुये है जिसके माध्यम से अवधि क्षेत्र विशेष रूप से प्रतापगढ़़ के ग्रामीण अंचलों के ठेठ पारम्परिक  लोक गीतों, खेलों, रीति रिवाजों संस्कृतियों, वेश भूषा, आदि का संकलनकिया जा रहा है। जिससे की भावी पीढ़ियों के लिये संस्कृतियां औैर परम्पराये संरक्षित रहे। ऐसा ही प्रयास बेल्हा के कुछ विशेष लोगों द्वारा किया जा रहा है, जो कि अपने कार्य क्षेत्र में बखूबी जिम्मेदारी निभाने के साथ साथ अवधी लोक परम्पराओं का संरक्षण एवं सम्वर्द्धन करने में जुटे हुये है
डॉ.शिवानी मातनहेलिया
संगीत की दुनिया में स्थानीय स्तर से शुरुआत कर उत्तर प्रदेश सरकार के सर्वोच्च सम्मान यश भारती सम्मान से नवाजी जाने वाली डॉ. शिवानी मातनहेलिया ने अंतर्राष्ट्रीय पटल पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया । यही नहीं कई विशिष्ट सम्मान पाने के बाद जब उनके सम्मान में जिले में लोगों ने कार्यक्रम आयोजित किये तो उन्होंने कहा कि मुझे इस क्षेत्र में कुछ कार्य दीजिये । जिससे मैं समाज में सम्मान को सार्थक साबित कर सकूँ । जहां तक मैंने महसूस किया डॉ. शिवानी मातनहेलिया की यह सोंच उनकी विशिष्टता को और बढ़ाता है । डॉ. शिवानी की माने तो उनकी सोंच हैं कि वह लोगों को यह बताएंगी कि संगीत को रोजगारपरक कैसे बनाया जाय । फिलहाल उन्होंने एक बेहतर सोंच के साथ लोक गीतों में निहित लोक  भाषा, परम्पराओं,रिश्तों का  अभिलेखीकरण के माध्यम से संकलन शुरू किया है ।यह संकलन ऐसा है जो अपने सहज मूल रूप में मिलेगा अर्थात ग्रामीण क्षेत्र की जो विशिष्टताएं हैं उन्हें उनकी भाषा में ही सुरक्षित रखा जा रहा है। जिसका मुख्य उद्देश्य उन्हीं मूल श्रोतों को जगह देकर उन्हें पहचान देना । ऐसे मूल श्रोतों को आधुनिक तकनीकी संसाधनों के माध्यम से सुरक्षित रखा जा रहा है । जिससे कि इसके द्वारा  आने वाली पीढ़ी जुड़ सके और विलुप्त हो रही लोक गीतों में निहित लोक भाषा,परम्पराओं,रिश्तों को  जान सके ।
राजमूर्ति सिंह ‘‘सौरभ’’
बतौर एडीओ समाज कल्याण अधिकारी कार्यरत राजमूर्ति सिंह सौरभ जनपद के प्रसिद्ध गजलकार है। वह अपनी गजलों में सदैव अवधी परम्पराओं, सम्बन्धों व रिवाजों का जिक्र किया करते है। उन्होंने गांव के खेलों को स्वस्थ मनोरंजन और पारस्परिक सहयोग एवं सौहार्द की भावना का सृजन करने वाला बताया है। बेल्हा की पारम्परिक खेलों को लेकर उनका लेख विशेष सराहनीय है जिसमे ंउन्होंने झाबर, शोर्रा, चिल्होर, ढुक्कुल या लुकाछिपी, चैवा-मग्धा, घोग्घों रानी, गुल्ली डंडा, काल कलौती, जिसमें जमीन पर लोटती हुये बच्चे पानी बरसाने की मांग करते हुये निम्न पंक्तियां दोहराते है।-
काल कलौती खेली थी, काले मेघा पानी दे।
नाही आपन नानी दे, पानी दे गुड़ धानी दे।
बीज बोवइया का उज्जर साफा, गोरिया क चूनर धानी दें।
काले मेघा पानी दे।
इसके अतिरिक्त उन्होंने लेदी-वेदी, होक्का बुक्का, चिगिड्डी जैसे लोक जीवन से जुडे उपरोक्त सभी खेलों को लोग भूलते जा रहे है। श्री सौरभ की माने तो वह बताते है यह व देश है जहां कृष्ण और सुदामा एक साथ जमुना किनारे कपड़े की गेंद से खेलते रहे है जिसके जमुना में गिर जाने से कालिया मर्दन की लीला हुई थी। लोक जीवन से जुड़े इन खेलों को पुर्नरजीवित करने की आवश्यकता है।
सुनील प्रभाकर
ग्राम विकास अधिकारी के संगठन का अगुवा होने के साथ साथ सुनील प्रभाकर न केवल एक साहित्यकार है बल्कि अवधी लोक परिवेश को गीत परम्परा के माध्यम से संजोने की बात करते है। प्रभाकर की माने तो अवध  की संस्कृति गीतों की गंगोत्री है अवधी लोक परिवेश की मर्यादित परम्परा यहां की उल्लास और रस सब कुछ लोक गीतों में रचा बसा है।
 उदाहरण स्वरूप गर्भ काल के नौ माह इसी प्रकार गाते बजाते गुजर जाते है। वह दिन भी आता है जब एक संतति  का जन्म होता है उस समय जिन गीतों की बहार आती है उनमें सोहर की अधिकता होती है-
(प) सोहर
 जुग जुग जिया सू ललनवां भवनवाॅं के भाग जागे हो।
ललना लाल होइहैं कुलवा के दीपक, जग उजियार होइहैं हो।
सासु सुहागिन बड़ भागिन, अन्य धनन लुटावाहि हो।
(पप) इस गीत के माध्यम से बाल सुलभ मनोदशा के गीत विशेष कर बच्चों को सुलाने मनाने या दुलारने के लिये गाये जाते
है।
मोर भइया, मोर भइया, सोना कली। जायं ससुररिया निहारैं गली।।
लाल लाल दुलहिन दुआरे खड़ी। अस मन होय लियाये चली।
(पपप)  जब बालक थोड़ा बड़ा होता है तो उसके मुन्डन की चिंता होनी लगती है। अवधी परिवेश में परिजनों के साथ उत्सव मनाने और सम्बन्धों को नयी उर्जा देने का चलन है। मुन्डन के दिन संतति की मां अपने मायके वालों को आवश्य बुलाने का निवेदन करती है।
सासू मोरा जियरा ई हुलसै, जौ विधि पुरवै-पुरवै हो।
सासू मोरे नइहर नउवा भेजतू रोचन पहुंचावत हो।
खास बात यह है कि मुन्डन चाहे एक रूपये के ब्लेड से ही बने पर गाया सोने का छूरा ही जाता है, जो यह संकेत देता है कि यह देश कभी सोने की चिड़िया था-
सोने की छुरवा मंगावौ, तौ नउवा बुलावौ हो । आज मोरे राम कै मुडनवा तौ दियना जरावौ हो।
(पअ) इसके बाद थोड़ा बड़े होते ही विद्यारंभ और  उपनयन या जनेऊ संस्कार कराया जाता है जिसके अवसर पर गीतों के माध्यम से बालक को सदाचार एवं ब्रम्हचर के महत्व का ज्ञान दिया जाता था।
खेतवा के मेड़वा पे निमिया के पेड़वा पे, तीन-तीन बइठे सुगनवा ना।
तीन-तीन पेड़वा पे तीन-तीन सुगना, बोला कुल केतना सुगना ना।।
केदरी के बन एक नरियर, नरियर काहे गुना हरियर हो, काहे गुना हरियर हो।
आज बाबा कउने रामा के नाती के जनेऊ, तो खराऊ बनवावइ हो।।
(अ) विवाह- विवाह का पूरा उत्सव ही गीतों से भरा है विवाह चाहे जिसका हो लेकिन गीतों में लड़के की मां कौशिल्या हो जाती है-
मचियई बइठि है रानी कौशिल्या , जेकर राजकुमार।
बारात तैयार होती तो बिना पूछे कोई जान सकता था कि किसके परिवार की बारात है और कहां जा रही हैः-
साजौ-साजौ हो संग संगातिया तो चलहु बरातिया में हो।
साथियां तो हाइहैं बाबा कवन रामा जेकर नतिया बियाहन जाॅंय।
साथियां तौ होईहै बाबू कवन रामा जेकर पुतवा बियाहन जाॅंय।
उधर लड़की पक्ष में भी गीत चलते रहते है लड़की को लोक गीतों के माध्यम से आगामी जीवन की शिक्षा दी जाती रहती है।
हटिया सेंधुरवा मंहग भये बाबा चुनरी भई अनमोल।
वहिरे सैंधुरवा के कारन बाबा, छोड़बैं मैं देशवा तोहार।
आगे मण्डप में प्रवेश करते समय दुल्हें और दुल्हन को लोक गीत के माध्यम से शिक्षा देने का प्रयाश शुरू हो जाता है जो इस प्रकार है-
जरा झुक के चलो दुल्हें राजा मंडप मोरा छोटा अहय।
सिरमें आपके भौरा सोह, झुक जइयो जरा सरकार लली मोरी छोटी अहय।।
धीरे- धीरे डाॅकिऊ दुआरी हो अभी बेटी बाटू कुआरी हो।
(अप) कन्या दान- कन्यादान के समय लोक गीत अत्यंत ही कारूणिक बना देते है।
कांपै लोटवा अउर कांपै थारी हो, कांपै हथवा में कुसवा के डारी हो ।
बाबा कौने रामा देत कुआरी के दान हो अब केस हंथवा बटोरऊ मोरे बाबा।
सुनील प्रभाकर जी का मानना है अवधी लोक परम्परा में उपरोक्त गीतों के अलावा पुनश्च, परिछन, गारी, विदाई चैता, कजरी, बिरहा, आल्हा, होरी, सरवन, आदि बहुत से ऐसे गीत है जो आदमी के जन्म से पहले से शुरू होते थे और आदमी के चले जाने पर भी गीत बचे रहते थे। इन गीतों के माध्यम से अवधी लोक परम्परा के संरक्षण एवं सम्वर्द्धन की महती आवश्यकता है अन्यथा आने वाले समय में समाज में रस बिहीन संकट उत्पन्न हो जायेगा।
इन्द्र प्रताप सिंह
पढ़ाई के साथ साथ लोक विधा की पारम्परिक शैलियों जैसे पूर्वी गीत, बारामासा, गंगागीत, जैसे लोक संगीतों का राष्ट्रीय स्तर के मंचो पर प्रदर्शन करने वाले इन्द्र प्रताप सिंह जिन्हें बेल्हा में लोक विधा की पराम्परिक शैलियों की शिक्षा के लिये भारत सरकार ने पहली छात्र वृत्ति दी है । डा0 शिवानी मातन हेलिया को संगीत के क्षेत्र में अपना आदर्श मानने वाले इन्द्र इस समय पढ़ाई के साथ साथ इस समय गांव गांव जाकर महिलाओं और पुरूषों के बीच में बैठ कर  अवधी परम्परा, संस्कृतियों और सम्बन्धों से जुड़े  गीत जैसे फलदान, उपनयन, बोआई, निराई, कटाई, पिसाई, ओसाई, भिक्षा, निरवही, कटउनी, रोपनी, और कारन गीत का संकलन आधुनिक संसाधनों के माध्यम से करने में जुटे है।
डा0 पीयूष कांत शर्मा  एवं निर्झर प्रतापगढ़ी
बेल्हा के ये दो ऐसे व्यक्तित्व है इनमें एक शिक्षण कार्य तो दूसरे तहसील में कार्यरत है। बावजूद इसके दोनों लोेग बेल्हा की संस्कृतियों को सहेजने और सवारने में जुटे हुये है। डा0 पीयूष कांत शर्मा ने जनपद वासियों को जिले की अतीत गाथाओं को अभिलेखी करण के द्वारा पुर्नजीवित किया। उन्होंने बेल्हा वासियों को अवगत कराया कि यह जनपद पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा हुआ है साथ ही साथ पुरातात्विक दृष्टि से इस जनपद का इतिहास मानव जीवन की शैशवावस्था से जुड़ा है। पुरातात्विक अनवेषणों से ज्ञात होता है कि उच्चा पुरापाषणिक संस्कृकित जनपद की प्राचीनतम संस्कृति है। सलेमान पर्वतपुर, और साल्हीपुर से पाषाण उपकरणों के रूप में प्राप्त होते है। इस संस्कृति को पुरावेदों ने 1700 ई0 पूर्व0 के आसपास माना है। जनपद के सर्वाधिकपुरा स्थल लगभग दो सौ की संख्या में इसी संस्कृति से सम्बन्धित है। जिनमें से सराय नाहर राय, महदहा, तथा दमदमा का उत्खनन किया गया है। जहां से बडी संख्या में मानव कंकाल, पाषाण उपकरण आदि मिले है। जबकि डा0 शर्मा ने पारम्परिक , पौराणिक इतिहास को भी लोगों को बताया की प्रतापगढ़ क्षेत्र अयोध्या के सूर्य वंश के अधीन था जिसकी स्थापना वैवस्वत मनु ने की थी। इस  वंश में इक्ष्वाकु पृथु, श्रावस्त, मान्धाता, हरिश्चन्द्र, अम्बरीश , दिलीप, रघु, दशरथ, राम जैसे प्रतापी शासन हुये। सम्भवतः दिलीप शासन काल में ही इस क्षेत्र ने कोशल नाम ग्रहण किया। पौराणिक परम्पराओं के अनुसार हण्डौर, पण्डवासी, अजगरा, महदहा, बारडीह, उॅंचडीह, आदि स्थल पाण्डवों से सम्बन्धित माने जाते है। ऐसे ही राजेश पाण्डेय उर्फ निर्झर प्रतापगढ़ी है। जो संस्कृतियों औैर परम्पराओं को लोगों तक पहुंचाने के लिये लगे हुये है। यहां तक की उन्होंने अपने प्रयास से जनपद में रानीगंज अजगरा में पहला संग्रहालय स्थापित कराया । लोग विरासतों के प्रति इस तरह जिद सी लिये रहते है यदि कोई बता दे कि 50 किलो मीटर दूर प्राचीन सभ्यता से जुड़ा पत्थर मौैजूद है तो वह अपने स्वयं के खर्चे से उसे संग्रहालय तक लाने के लिये प्रयासरत रहते है।
डा0 बृजभानु सिंह एवं हेमन्त नन्दन ओझा
बेल्हा के ये दो ऐसे नाम है जिन्होंने बेल्हा लोक महोत्सव का आयोजन कर लोक कलाओं एवं संस्कृतियों को एक मंच दिया। इस मंच के माध्यम से प्रतापगढ़ में एक उम्मीद जगी की अब लोक विधाओं के संरक्षण एवं सम्बर्द्धन के लिये एक बेहतर प्रयास शुरू किया गया है। बेल्हा लोक महोत्सव में विलुप्त प्राय अवधी गीत संगीत और नृत्य खोज खोज कर प्रस्तुत किये गये । लोक महोत्सव में फैसन एवं आधुनिकता के बोझ तले दबते जा रहे जीवन में खुशी के रंग भरने के लिये विभिन्न सांस्कृति आयामों को उपर लाने का प्रयास किया गया। बेल्हा लोक महोत्सव एक ऐसा गौरवशाली मंच रहा जिसमें तमाम ऐसे  कलाकार थे जो समाज में हेय दृष्टि से देखी जाने लगे थे एवं मायूसी व मुफलिसी का जीवन जी रहे थे उन्हें एक मंच पर लाकर सम्मान के साथ नया जीवन दिया गया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.