भयहरणनाथ धाम: बकासुर राक्षस का अन्त करके किया था भय का हरण

भयहरणनाथ धाम: बकासुर राक्षस का अन्त करके किया था भय का हरण

प्रसिद्ध पांडव कालीन धार्मिक, एतिहासिक व आध्यात्मिक स्थल भयहरणनाथ धाम जनपद
प्रतापग-सजय में मुख्यालय के दक्षिण लगभग 30 किमी0 तथा इलाहाबाद के उत्तर लगभग
36 किमी0 पर कटरा गुलाब सिंह के पास स्थित है। लगभग 10 एकड के क्षेत्रफल में
फैले इस धाम में पाण्डवों द्वारा स्थापित शिवलिंग के मुख्य मन्दिर के अलावा
हनुमान, शिव पार्वती, संतोषी मां, राधा कृष्ण, विश्वकर्मा भगवान, बैजूबाबा
आदि का मंदिर है। अपनी प्राकृतिक एवं अनुपम छटा तथा बकुलाही नदी के तट पर
स्थित होने के नाते यह स्थल आध्यात्मिक दृष्टि से काफी जीवन्त है। यह धाम जहां
क्षेत्र के लाखों लोगों के लिए आस्था व विश्वास का केन्द्र है वहीं अपनी
विभिन्न गतिविधियों के कारण यह स्थल सामाजिक विकास के केन्द्र के रूप में भी
स्थापित हो चुका है।
लोकमान्यता है कि महाभारत काल में द्युत क्रीडा में पराजित होने के बाद
पाण्डवों को जब 12 वर्ष के लिए बनवास में जाना पडा था उसी दौरान उनके द्वारा
इसी स्थल पर शिवलिंग की स्थापना की गई थी। कहा जाता है कि पाण्डवों नें
अपने आत्मविश्वास को पुनजार्गृत करने के लिए इस शिवलिंग को स्थापित किया था।
इसी नाते इसे भयहरणनाथ की संज्ञा से सम्बोधित किया गया। वहीं यह भी माना जाता
है कि इस दौरान भीम ने यहां बकासुर नामक राक्षस का बध कर ग्रामवासियों के भय
का हरण किया था। बध के पश्चात यहां शिवलिंग स्थापित किया जिससे इस धाम का नाम
भयहरणनाथ धाम पडा। इस क्षेत्र में महाभारत काल के और कई पौराणिक स्थल
तथा भग्नावशेष आज भी मौजूद है। जिसमें उंचडीह का टीला तथा उसकी
खुदाई से प्राप्त मूर्तियां, स्वरूपपुर गांव का सूर्य मन्दिर तथा कमासिन में कामाख्या
देवी का मन्दिर प्रमुख है। इस सब के सम्बन्ध में तरह तरह की लोक श्रुतियां,
मान्यताएं प्रचलित हैं।
ग्रामसभा पूरेतोरई में पूर्व की ओर बकुलाही नदी के पावन तट पर बने
टीले के उपर एक भव्य भवभयहरननाथ मन्दिर बना है। जो मीलों दूर से
दिखाई पडता है। यहां की प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है। पश्चिम से बकुलाही
नदी आकर भोलेनाथ को भेटती हुई उत्तराभिमुखी हो गई हैं। पश्चिम
में शिवगंगा ताल था जो अब खेतों में परिवर्तित हो चुका है, क्षेत्रीय समाज व
सरकार के सहयोग से शिवगंगा ताल का लघु स्वरूप पुनः कायम हुआ है। भयहरणनाथयहां बुलाते हैं पंचायत 

क्षेत्रीय जनता अपने पारस्परिक विवादों को निपटाने के लिए इस स्थान का उपयोग
पंचायत बुलाकर करते हैं। धार्मिक, सामाजिक एवं क्षेत्रीय विकास तथा कल्याण सभाएं
और गोष्ठियां प्रायः यहां आयोजित होती हैं तथा यही निर्णय लिए जाते हैं।
यहां मेलों के अवसर पर इस क्षेत्र की सांस्कृतिक परम्परा का अवलोकन सहज रूप से किया जा
सकता है। नाच.गाने, वेषभूषा एवं रीति रिवाज का अच्छा खासा दृश्य परिलक्षित होता
है। प्रत्येक अवसर पर भीड के समय पुलिस प्रशासन की चुस्त व्यवस्था रहती है। इसी
गांव में जन्में सामाजिक चिन्तक श्री चन्द्र शेखर प्राण के मागदर्शन में प्रसिद्ध
समाजसेवी स्व0 लालता प्रसाद सिंह व स्व0 राम चन्द्र जौहर के नेतृत्व में विगत 2 दशक
पूर्व सामाजिक भागीदारी से इस धाम के विकास के लिए निरन्तर प्रयास किया जा रहा है।
लालता प्रसाद सिंह के निधन के पश्चात युवा सामाजिक कार्यकर्ता समाज शेखर पर नेतृत्व की
जिम्मेदारी आई जिसे पिछले डे-सजय दशक से वह कुशलता के साथ निभाते हुए
भयहरणनाथ धाम क्षेत्रीय विकास संस्थान का विधिवत स्वरूप दिया है। क्षेत्र के 250
से अधिक लोग इसके सक्रिय सदस्य हैं तथा 35 लोग कार्य समिति में हैं। मेला व
मन्दिर व्यवस्था के लिए अलग अलग संस्थान की उपसमितियां बनी हैं जो अपने
दायित्वों का निर्वहन करती है। धाम के संरक्षक एवं मुख्य पुजारी भोलानाथ
तिवारी सभी के सहयोग आदि से पूजा का प्रबन्ध अन्य पुजारियों और कर्मचारियों की
मदद से है।
धाम पर पंचपरमेश्वर ग्रामीण पुस्तकालय एवं सूचना केन्द्र, चरक वाटिका,
पंचपरेश्वर चैपाल, श्री श्री रविशंकर ज्ञान मन्दिर, जन सहायता केन्द्र , बकुलाही नदी
पुनरोद्धार अभियान आदि का सफल संचालन एक दशक से जारी है। पिछले 17 वर्षों से
महाशिवरात्रि पर चार द्विवसीय महाकाल महोत्सव, नागपंचमी पर घुघुरी उत्सव ने परम्परा
का स्वरूप ग्रहण करके इस धाम का महत्व राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्थापित किया
है।

धाम पर देश विदेश के महत्वपूर्ण व्यक्तियों का विभिन्न कार्यक्रमों
में आगमन होता रहता है। आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर, जगद्गुरू शंकराचार्य
स्वामी बासुदेवानन्द जी, स्वामी पत्री जी महराज, सुन्दर लाल बहुगुणा, जलपुरूष
राजेन्द्र सिंह, बरिष्ठ समाजकर्मी पी0बी0 राजगोपाल, बरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय, बलदेव
भाई शर्मा आदि धाम पर पधार कर समय समय पर मागदर्शन करते रहते हैं। विगत
वर्षों में स्काटलैन्ड के विभिन्न विश्वविद्यालयों के चार प्रोफेसरों का
अध्ययन दल धाम के महत्व व आसपास के सामाजिक जागरण व विकास का अध्ययन करने हेतु
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ततकालीन कुलपति प्रो0 जनक पाण्डेय के नेतृत्व में आया
था। साथ ही मलेशिया, मारीशस एवं फांन्स से विदेशी विद्वान यहां पधार चुके
हैं।इस प्रकार यह स्पष्ट है कि धाम का धार्मिक महत्व जहां काफी ब-सजया है वहीं यह
आसपास के परिवेश के सामाजिक विकास के केन्द्र के रूप में भी स्थापित हो रहा है।
बकुलाही नदी की प्राचीन 21.4 किमी0 धारा के पुनरोद्धार का संकल्प व प्रेरणा इसी
जागृत स्थल का ही परिणाम है। आज समाज और सरकार के सहयोग से नदी की इस प्राचीन
धारा का पुनरोधार पूर्ण हो चुका है। धाम में 26 जनवरी से प्रत्येक मंगलवार
मेले में निरन्‍तर सामाजिक सहयोग से जन सहायता केन्द्र के माध्यम से सैकडों आमजन की
व्यक्तिगत और सार्वजनिक समस्याओं का सहज रूप से समाधान हो रहा है। अभी तक इस
केन्द्र के माध्यम से कुल 4 व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं। वहीं धाम पर च-सजयने वाले
ध्वज पताकों का 1 जनवरी 2016 से किया जा रहा है। जिसें अभी तक कुल 374 परिवारों
द्वारा 953 ध्वज पताका च-सजयाया गया। जिसमें कुल 37041 व्यक्ति सिर्फ ध्वज पताका च-सजयाने
हेतु धाम पर आए। समाज व सरकार की भागीदारी से यह धाम निरन्तर विकसित हो रहा है।

भयहरण नाथ धाम में डीजे वाद्ययंत्र से मिली निजात
देशी वाद्ययंत्रो को दिया जा रहा बढ़ावा प्रसिद्ध पांडव कालीन धाम भयहरण नाथ धाम में धाम की प्रबंध समिति और स्थानीय प्रबुद्ध समाज के साझा प्रयास से धाम परिसर को कान फोडू आवाज करने वाले डी जे से निजात एक  साल से मिल गई है l अब यहाँ फिर प्राचीन देशी वाद्ययंत्रो को बढ़ावा दिया जा रहा है l जिससे एक वोर जहाँ धाम पर प्रत्येक मंगलवार को लगने वाले मेले में आये हजारो श्रद्धालु भक्तो एवं जनसामान्य एवं दुकानदारो को राहत मिली है वहीँ देशी वाद्ययंत्रो को परम्परागत रूप से बजाने वालो में खुशी है की उनका हुनर पुनः धाम पर प्रतिष्ठित हो रहा है और उनकी रोजी रोटी भी अच्छी चल रही है l
भयहरण नाथ धाम में प्रत्येक मंगलवार मेले में बड़ी संख्या में लोग प्राचीन काल से ध्वज पताका चढाते आ रहे है l आज के एक डेढ़ दशक पूर्व लोग देशी बाजे गाजे के साथ ध्वज पताका चढाते थे l परन्तु डीजे के धुन ने इस समाज के आम आवाम को भी प्रभावित किया जिससे यहाँ धाम पर लोग डीजे के साथ निशान लाना अपनी शान समझने लगे l इसका दुष्प्रभाव यह हुआ की धाम पर परमानेंट रहने वाले साधु संतो , कार्यकर्ताओ और दुकानदारो को तो सुनाई भी कम पड़ने लगा था l लोग डीजे के साथ अनावश्यक गाने बजाते थे और आपस में लड़ाई झगडा भी करते थे l लोग नशा करके भी आते थे जिससे अपना नियंत्रण खोये रहते थे l धाम परिसर में तो लोग आपस में बात कर ही नहीं सकते थे l सबसे अधिक परेशानी सैकड़ो दुकानदारो को होती थी जो किसी भी ग्राहक से बात करने में बहुत अधिक उर्जा व्यय करते थे l
इस सभी समस्याओ को ध्यान में रखते हुए सामाजिक कार्यकर्ता समाज शेखर जो इस धाम की प्रबंध समिति के महासचिव है ने एक जून २०१२ में समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों के साथ पहल की l सर्वप्रथम प्रबंध समिति की बैठक कर तय हुआ की धाम परिसर में डी जी को प्रतिबंधित किया जाये l उसके बाद इसको धरातल पर उतरना बड़ा चुनौती पूर्ण रहा l गरीब और कम पढ़ा लिखा इसको समझ नहीं पा रहा था l रसूखदार और ज्ञानी लोग समझना नहीं चाह रहे थे l लेकिन प्रयास जारी रहा लोगो को टोकने और समझाने का l अब सबकी समझ में आ गया है जो नहीं समझ पाता तो कार्यकर्ता उन्हें समझाते है l अब डीजे धाम परिसर में पूरी तरह से प्रतिबंधित है , लोग या तो डीजे लाते ही नहीं , लाते नही है तो मुख्य गेट के बाहर तक ही लाते है l अब श्रद्धालु भक्त गण देशी गाजे बाजे , ढोल , तासे आदि का प्रयोग लोग कर रहे है जिससे सुगम आवाज में धाम परिसर की पवित्रता पुनः बढ़ रही है और बहुत सारे हुनरमंद लोगो को फिर से काम भी मिल रहा है l

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