स्‍मार्ट क्‍लास नहीं पहले ब्‍लैक बोर्ड तो दीजिये स्‍कूलों को

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क्रासर- देश के पचास हजार सरकारी स्‍कूलों में ब्‍लैक बोर्ड तक नहीं है

ब्‍लैक बोर्ड नाम आते ही स्‍कूल, बचपन और स्‍कूली दिनों की मौजमस्‍ती आंखों में तैरने लगती है। ब्‍लैक बोर्ड का रंग काला होता है लेकिन यही ब्‍लैक बोर्ड देश का भविष्‍य संवारता है। देश को कुश्‍ल नेतृत्‍व देता है। दिशा देता है। इसके रंग में छिपी होती है भविष्‍य की सुनहरी तस्‍वीर। ब्‍लैक बोर्ड स्‍कूल की सबसे अनिवार्य शर्त होती है। आज भले ही लोग स्‍मार्ट क्‍लास ई क्‍लास की बात करें लेकिन ब्‍लैक बोर्ड पर लिखी इबारत सवालों को हल करने का फार्मूला कितना सहज और कारगर होता है। क्‍या आप जानते हैं कि देश के पचास हजार स्‍कूलों में ब्‍लैक बोर्ड तक नहीं है। हमारे देश में शिक्षा में सुधार के लिए कमेटियां बनती हैं। आयोग बनते हैं। कुछ अभियान चलते हैं लेकिन कुछ कदम जाकर या तो सुस्‍ताने लगते हैं या थम जाते हैं। देश की करीब 78 फीसद आबादी गांवों में रहती है। ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक शिक्षा के आम भारतीय जन सरकारी स्कूलों पर निर्भर रहते हैं। लेकिन नौनिहालों के भविष्य को गढ़ने वाले सरकारी स्कूल खुद बीमार है। 2002 में प्राथमिक शिक्षा को मूल अधिकार में शामिल करने की बात कही गई। 2009 में आरटीई बना, 1 अप्रैल 2010 को शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू किया गया। लेकिन प्राथमिक शिक्षा पर किसी ने जमीनी स्‍तर पर कोई कार्रवाई नहीं की। एक आंकडे के मुताबिक देश में 70 फीसदी सरकारी स्‍कूल और 30 फीसदी प्राइवेट स्‍कूल हैं। सरकारी स्‍कूलों की दशा किसी से छिपी नहीं है।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजूकेशन प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन (एनआइइपीए) के मुताबिक देश में 42 हजार स्कूलों के पास अपने भवन त्तक नहीं है। एक लाख से ज्यादा स्कूल ऐसे जिनके पास भवन के नाम पर एक ही क्‍लासरूम है । यूपी में करीब 11 सौ स्कूल खेत या खुले में पेड के नीचे लगते हैं। उत्‍तर प्रदेश में टीचर भर्ती अभियान हर बार मुंह की खाता है। इस समय स्कूलों में एक लाख 77 हजार शिक्षक कार्यरत हैं। उत्‍तर प्रदेश में ही 42 हजार स्कूलों में एक शिक्षक तैनात हैं जबकि 62 हजार स्कूलों में दो शिक्षक हैं। पढाई का आलम यह है कि तीन साल तक स्कूल जाने के बाद 60 फीसद से ज्यादा बच्चे अपना नाम तक नहीं पढ़ पाते। कक्षा एक में नाम लिखाने वाले बच्‍चों में 50 फीसद बच्चे ही कक्षा दसवीं तक पहुंचते हैं। यूपी के सरकारी स्‍कूलों की दशा सुधारने के लिए तत्‍काल एक लाख 10 हजार स्कूल में चार लाख 86 हजार से ज्यादा शिक्षकों की जरूरत है। जहां तक शिक्षकों की योग्यता का मामला है तो सरकारी स्कूलों में प्राइवेट स्कूलों से ज्यादा योग्य शिक्षक हैं। लेकिन सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, शिक्षकों का समय पर स्कूल न आने की वजह से वो अपने बच्चों को नहीं भेजना चाहते हैं।
प्राथमिक शिक्षा की बदहाली के लिए किसी विशेष सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। देश की इतनी बड़ी आबादी तक शिक्षा सुलभ करने के लिए सरकार को अपनी जीडीपी का कम से कम 6 फीसद खर्च करना चाहिए। लेकिन मुश्किल से शिक्षा पर खर्च की जाने वाली ये रकम करीब 2 प्रतिशतही है। यूपी में प्राथमिक शिक्षा में सुधार को संकल्पित योगी सरकार को हाईकोर्ट के उस आदेश के प्रति भी गंभीर होना होगा जिसमें कोर्ट ने साफ साफ तौर पर कहा है कि राजकोष से वेतन व भत्‍ते पाने वाले मंत्री, विधायक, अफसर और बाबू अपने बच्‍चों को सरकारी स्‍कूल में पढाये तभी यूपी में प्राथमिक शिक्षा का स्‍तर सुधर सकता है। छत्‍तीसगढ में बलरामपुर के कलेक्‍टर अवनीश शरण ने अपनी बेटी को प्‍ले स्‍कूल न भेजकर पहले आंगनवाडी भेजा बाद में सरकारी स्‍कूल में नाम लिखाकर शिक्षा में सुधार की जो पहल की है वैसी ही पहल पूरे देश में होनी चाहिए। खासतौर पर यूपी में ऐसी शुरूआत की सख्‍त जरूरत है।

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